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वर्ण विचार, शब्द विचार, पद परिचय, संधि, समास, कारक और मुहावरे। नियमों की स्पष्ट व्याख्या, उदाहरण, अशुद्धि शोधन, अभ्यास प्रश्न व उत्तरमाला।
भाषा की वह सबसे छोटी इकाई जिसके और टुकड़े न किए जा सकें, उसे वर्ण कहते हैं। उच्चारित ध्वनियों के लिखित रूप को वर्ण कहा जाता है। वर्णों का व्यवस्थित और क्रमित समूह 'वर्णमाला' कहलाता है। देवनागरी लिपि में कुल 52 मानक वर्ण स्वीकृत हैं।
जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अन्य ध्वनि या रुकावट के स्वतंत्र रूप से फेफड़ों से निकली वायु के माध्यम से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। हिन्दी में स्वरों की संख्या 11 है।
जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से किया जाता है तथा जिनके उच्चारण में हवा मुख के किसी न किसी भाग (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ) को स्पर्श करके बाहर निकलती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। मूल व्यंजनों की संख्या 33 है।
दो या दो से अधिक वर्णों के ऐसे स्वतंत्र एवं सार्थक समूह को शब्द कहते हैं जो निश्चित अर्थ प्रकट करे। बनावट, उत्पत्ति, अर्थ और परिवर्तन के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण किया जाता है।
सार्थक शब्दों का वह व्यवस्थित समूह जो किसी विचार को पूर्ण रूप से स्पष्ट प्रकट करे, वाक्य कहलाता है। वाक्य के दो मुख्य अंग होते हैं: उद्देश्य (Subject) और विधेय (Predicate)।
किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी, गुण, दशा या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं। संसार में जितनी भी वस्तुएं हैं, उनका कोई न कोई नाम है, वही नाम उनकी संज्ञा है।
संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं। सर्वनाम का प्रयोग भाषा को सुंदर, संक्षिप्त और पुनरुक्ति (반복) दोष से मुक्त बनाने के लिए किया जाता है। सर्वनाम के 6 भेद हैं।
संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, दोष, रूप, रंग, आकार, संख्या, परिमाण आदि) बताने वाले शब्दों को विशेषण कहते हैं। जिसकी विशेषता बताई जाती है, उसे 'विशेष्य' कहते हैं।
जिस शब्द से किसी कार्य के करने, होने या किसी स्थिति का बोध हो, उसे क्रिया कहते हैं। क्रिया का मूल रूप 'धातु' (Root verb) कहलाता है। कर्म के आधार पर क्रिया के दो मुख्य भेद हैं: सकर्मक और अकर्मक।
जो अविकारी शब्द क्रिया की विशेषता (समय, स्थान, मात्रा या रीति) बताते हैं, उन्हें क्रिया विशेषण कहते हैं। क्रिया विशेषण के 4 मुख्य भेद होते हैं।
संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु या प्राणी के पुरुष जाति (Male) या स्त्री जाति (Female) होने का बोध हो, उसे लिंग कहते हैं। हिन्दी व्याकरण में केवल 2 लिंग स्वीकृत हैं: पुल्लिंग और स्त्रीलिंग।
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण या क्रिया के जिस रूप से उसकी संख्या (एक या एक से अधिक) का बोध हो, उसे वचन कहते हैं। हिन्दी में 2 वचन होते हैं: एकवचन और बहुवचन।
व्याकरण में वक्ता (बोलने वाला), श्रोता (सुनने वाला) या जिसके विषय में बात की जा रही हो, उनके लिए प्रयुक्त सर्वनाम रूपों को 'पुरुष' कहते हैं। पुरुषवाचक सर्वनाम के 3 भेद होते हैं।
क्रिया के जिस रूप से उसके निष्पादन (होने या करने) के समय का तथा उसकी पूर्णता या अपूर्णता का बोध हो, उसे काल कहते हैं। काल के 3 मुख्य भेद हैं: भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यतकाल।
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका संबंध वाक्य की क्रिया तथा अन्य शब्दों के साथ जाना जाता है, उसे कारक कहते हैं। कारकों को प्रकट करने वाले चिन्हों को 'विभक्ति चिन्ह' या 'परसर्ग' कहते हैं। हिन्दी में 8 कारक हैं।
क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि वाक्य में क्रिया के लिंग और वचन कर्ता, कर्म या भाव के अनुसार प्रयुक्त हुए हैं, उसे वाच्य कहते हैं। बोर्ड परीक्षा में वाच्य परिवर्तन 4 अंकों का आता है।
दो या दो से अधिक सार्थक शब्दों के मेल से बने नए और संक्षिप्त शब्द को समास कहते हैं। समासी पदों को पुनः अलग-अलग करने की प्रक्रिया 'समास-विग्रह' कहलाती है। समास के 6 मुख्य भेद हैं।
दो समीपवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है, उसे संधि कहते हैं। संधि के 3 मुख्य भेद हैं: स्वर संधि, व्यंजन संधि और विसर्ग संधि। स्वर संधि के 5 उपभेद होते हैं।
जो शब्दांश किसी शब्द के पूर्व (प्रारंभ) में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन, विशेषता या नयापन ला देते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं। उपसर्गों का अपना स्वतंत्र प्रयोग नहीं होता।
जो शब्दांश किसी शब्द के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या नए शब्द का निर्माण करते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं। प्रत्यय के दो मुख्य भेद होते हैं: कृत् प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय।
जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, कारक या काल के कारण कोई परिवर्तन (विकार) नहीं होता तथा जो सदैव अपने मूल रूप में बने रहते हैं, उन्हें अव्यय या अविकारी शब्द कहते हैं।
वाक्य को लिखते समय विराम (रुकने) को स्पष्ट करने के लिए जिन सांकेतिक चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें विराम चिन्ह कहते हैं। विराम चिन्हों के सही प्रयोग से वाक्य का अर्थ स्पष्ट और प्रभावपूर्ण होता है।
वाक्य में व्याकरणिक नियमों की अज्ञानता के कारण होने वाली त्रुटियों (लिंग, वचन, कारक, पदक्रम, पुनरुक्ति आदि) को पहचानकर वाक्य को शुद्ध रूप में लिखना 'अशुद्धि शोधन' कहलाता है।
मुहावरा ऐसा वाक्यांश है जो अपने सामान्य (वाच्यार्थ) अर्थ को छोड़कर कोई विशेष लाक्षणिक अर्थ प्रकट करता है। मुहावरे का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि वाक्य के बीच में होता है।
लोक (समाज) में लंबे समय के अनुभव से प्रचलित ऐसे स्वतंत्र पूर्ण वाक्यों को लोकोक्ति या कहावत कहते हैं, जिनमें कोई न कोई नीति, सत्य या जीवन का अनुभव निहित होता है।